Mahashivratri

वह हिम-सा शांत, वह अग्नि-सी कोमल,
दोनों में एक ही स्पंदन निर्मल।
वह तप के सागर, वह श्रद्धा की धारा,
दोनों का मिलन — सृष्टि का सहारा।
वह जटाओं में गंगा को थामे,
वह नयनों में ब्रह्मांड को थामे।
वह विरक्ति का गहरा अँधेरा,
वह प्रेम का उजला सवेरा।
कैलाश की चोटी पर बैठा ध्यान,
उसकी दृष्टि में बस पार्वती का मान।
वह त्याग की पराकाष्ठा, वह समर्पण की सीमा,
उनके प्रेम में नहीं कोई रीति, नहीं कोई लीला।
न शब्दों का शोर, न वादों की रीत,
उनका प्रेम स्वयं में एक अनंत गीत।
जहाँ वह आधा, वहाँ वह आधी,
दोनों मिलकर पूर्णता की परिभाषा साधी।
वह शिव हैं तो वह शक्ति का विस्तार,
वह शक्ति हैं तो शिव का आकार।
प्रेम जहाँ अहंकार से परे हो जाता,
वहीं शिव-पार्वती का मिलन कहलाता।
न आरंभ, न अंत उस बंधन का,
वह सत्य है सृष्टि के प्रत्येक कण का।
जो प्रेम तप में भी मुस्काए,
वही शिव-पार्वती का प्रेम कहलाए।

हर हर महादेव🙏🙏

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